“मोबाइल गेम” का मामला नहीं है, बल्कि बढ़ते डिजिटल दबाव, अकेलेपन और भावनात्मक असहायता का भी प्रतिबिंब है।
हमारे बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य कितना सुरक्षित है?
अभी कल ही गाजियाबाद उत्तर प्रदेश की एक हृदयविदारक घटना जिसने की हर एक जागरूक मां बाप को हिला कर रख दिया कि तीन नाबालिग बहनों ने एक मोबाईल की गेम के कारण अपने आप को जाने किन मानसिक परिस्थितियों के वशीभूत होकर अपने अपार्टमेंट की 9 वीं मंजिल से छलांग लगा कर सामुहिक आत्महत्या कर ली।
16 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर और अन्य सभी प्रोग्राम जिसमें की गेमिंग भी आती हैं, क्या हमारा सिस्टम इतना कमजोर है कि नाबालिग बच्चों के लिए सोशल प्लेटफॉर्म पूरी तरह से बैन होने चाहिए।
कईं बार जाने अनजाने छोटे बच्चों के कार्टून प्रोग्राम में भी ऐसी सामग्री परोसी जाती हैं जोकि वयस्क लोगों के लिए होती हैं।
ये जोकि कोरियन गेम्स हैं बहुत ही एक बहुत ही मनोवैज्ञानिक शातिराना ढंग से टीनएजर्स को ध्यान में रखते हुए बनायी जाती हैं जिनमें की टास्क भी पहले तो बहुत ही आसान होते हैं और इन टीनएजर्स को लुभाने के लिए कुछ गिफ्ट्स भी रखते हैं फिर धीरे - धीरे इनके टास्क भी जटिल और कठिन होते रहते हैं जिनसे की इन मासूम टीनएजर्स के मन पर अचानक दबाव पड़ता है और ये अवसाद से घिर जाते हैं, बस फिर ये इन गेम्स और प्रोग्राम्स को हैंडल करने वाले समझ जाते हैं कि अब ये पूरी तरह से जाल में फंस चुके हैं फिर उनके लिए खतरनाक टास्क जिसमें की आत्महत्या या मर्डर भी शामिल हो सकते हैं देते हैं इन मासूमों के पास अब कोई विकल्प नहीं रहता है कि जिससे ये इस जाल से निकल सकें, अंतिम विकल्प बहुत डरावने और खतरनाक होते हैं।
यह आज के युग में बहुत गंभीर और दर्दनाक विषय है — चिंता की बात है ऐसी घटनाएँ केवल “एक गेम की वजह से” नहीं होतीं, बल्कि कई मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक और डिजिटल कारकों का मिश्रण होती हैं।
📌 गाजियाबाद जैसी घटनाएँ हमें तीन बड़े सवालों के सामने खड़ा करती हैं:
बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य कितना सुरक्षित है?
डिजिटल दुनिया में उनकी सुरक्षा के लिए कौन ज़िम्मेदार है?
परिवार, स्कूल और समाज अपनी भूमिका कितनी ईमानदारी से निभा रहे हैं?
यह केवल एक “मोबाइल गेम” का मामला नहीं है, बल्कि बढ़ते डिजिटल दबाव, अकेलेपन और भावनात्मक असहायता का भी प्रतिबिंब है।
🔹 संभावित कारणों का विश्लेषण
1) सोशल मीडिया और गेमिंग का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
आज के कई गेम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आदत डालने वाले (addictive) डिज़ाइन पर आधारित हैं — जैसे लगातार रिवॉर्ड, लेवल-अप, स्ट्रीक्स आदि।
इससे बच्चों में असफलता का डर, तुलना, FOMO (कुछ छूट जाने का डर) और दबाव बढ़ता है।
अगर बच्चा पहले से तनाव, अकेलापन या पारिवारिक समस्या झेल रहा हो, तो ये चीज़ें उसे और कमज़ोर बना सकती हैं।
2) भावनात्मक उपेक्षा और संवाद की कमी
कई घरों में बच्चे खुलकर बात नहीं कर पाते — डर, डाँट या गलत समझे जाने के कारण।
जब बच्चे अंदर ही अंदर टूट रहे होते हैं, तो अक्सर वयस्कों को देर से पता चलता है।
3) डिजिटल निगरानी की कमी
कम उम्र में अनियंत्रित इंटरनेट एक्सेस, बिना फ़िल्टर वाले कंटेंट और अनजान लोगों से संपर्क जोखिम बढ़ाता है।
बहुत से माता-पिता तकनीक से कम परिचित होते हैं, जिससे वे बच्चों की ऑनलाइन दुनिया पर नज़र नहीं रख पाते।
4) स्कूल और समाज की भूमिका
स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा अभी भी पर्याप्त नहीं है।
हम अकादमिक दबाव तो बहुत देते हैं, लेकिन भावनात्मक मजबूती (emotional resilience) सिखाने पर कम ध्यान देते हैं।
🔹 नीति और नियमों के स्तर पर क्या होना चाहिए?
सरकार और नियामक संस्थाएँ
16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए:
सख़्त उम्र-प्रतिबंध (age-gating)
अत्यधिक addictive गेमिंग फीचर्स पर नियंत्रण
डेटा-ट्रैकिंग और एल्गोरिदम पर निगरानी
स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग अनिवार्य करना।
टेक कंपनियों की ज़िम्मेदारी
बच्चों के लिए अलग, सुरक्षित डिजिटल वातावरण।
खतरनाक या अत्यधिक addictive गेमिंग मैकेनिक्स पर रोक।
माता-पिता के लिए बेहतर Parental Control Tools।
🔹 माता-पिता और परिवार क्या कर सकते हैं?
बिना डराए, लेकिन व्यावहारिक तरीके से:
स्क्रीन टाइम तय करें (रूटीन बनाएं, सज़ा नहीं)
बच्चों से खुलकर बात करें, जज किए बिना सुनें
उनके दोस्तों, ऑनलाइन गतिविधियों और रुचियों में दिलचस्पी लें
घर में भावनात्मक सुरक्षित माहौल बनाएं
अगर बच्चा असामान्य रूप से चुप, अलग-थलग या परेशान दिखे, तो काउंसलर की मदद लें
🔹अंतिम निष्कर्ष (Conclusion)
यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि:
“डिजिटल युग में बच्चों को सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि सुरक्षा, मार्गदर्शन और भावनात्मक सहारा भी चाहिए।”
समाधान किसी एक चीज़ पर बैन लगाने में नहीं, बल्कि संतुलन, जागरूकता और ज़िम्मेदारी में है — परिवार, स्कूल, समाज और Tec कंपनियाँ सब मिलकर।



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