संतों का और उनकी वाणी, उनके सत्कर्मों का वर्गीकरण करना समाज व समस्त मनुष्य जाति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण - विनीत सिंह

संतों का और उनकी  वाणी, उनके सत्कर्मों का वर्गीकरण करना समाज व समस्त मनुष्य जाति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण - विनीत सिंह समाज सेवक वार्ड नं. 14, सोलन

विनीत सिंह ने कहा कि बड़ी अजीब ही विडंबना है मनुष्य समाज की जहाँ मनुष्य नेचर की सबसे सुन्दर कृति है जिसमें की अलग - अलग शक़्ल और सूरत के साथ उसको एक सुन्दर सुडौल शरीर दिया है साथ ही एक शक्तिशाली मस्तिष्क भी दिया है जिसमें की सोच और विचार लगभग सभी मनुष्यों में अलग अलग डाली है। 

हर मनुष्य की सोच, विचार और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं।

यही विविधता मानव समाज की असली सुंदरता होनी चाहिए थी।

विनीत सिंह ने पाषाण युग से आधुनिक समाज तक की यात्रा को एक सबसे बड़ा विकास बताया 

जहां प्रारंभिक पाषाण युग में मनुष्य छोटे-छोटे कबीलों में, अपने परिवार के साथ सामूहिक जीवन जीता था।

समय के साथ कबीलों में भी विभाजन हुआ।

जैसे-जैसे सभ्यता आगे बढ़ी, मनुष्य ने अपने विचारों के आधार पर समाज की संरचना की और फिर विचारों से विभाजन की ओर समाज का विकास होते-होते मनुष्य धर्म, जाति, वर्ण और वर्गों में बँट गया।

जो विचार समाज को जोड़ने के लिए थे, वही धीरे-धीरे विभाजन का कारण बन गए।

पहचान अब “मनुष्य” से ज़्यादा “समुदाय” और “वर्ग” से होने लगी।

विनीत सिंह ने कहा कि संतों और धर्मगुरुओं का भी वर्गीकरण हो रहा है जबकि संतों का उद्देश्य सदैव समाज को सही मार्ग दिखाना, प्रेम, करुणा और समानता का संदेश देना रहा है।

संतों की वाणी किसी एक वर्ग के लिए नहीं बल्कि पूरे मानव समाज के लिए होती है।

फिर भी समाज ने संतों को भी धर्म, जाति या संप्रदाय के चश्मे से देखना शुरू कर दिया।

*यह प्रश्न उठता है कि जिनका उद्देश्य समाज कल्याण है, उन्हें किसी एक वर्ग से जोड़ना कितना उचित है?

विनीत सिंह ने आधुनिक विज्ञान बनाम पुरातन ज्ञान की और ध्यान खींचते हुए कहा कि आज विज्ञान ने पूरे विश्व में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।

रोज़ नए-नए आविष्कार हो रहे हैं, तकनीक जीवन को आसान बना रही है।

लेकिन इसी के साथ हमारा पुरातन ज्ञान, संस्कृति और मूल्य कहीं न कहीं भटकते नज़र आ रहे हैं।

संतुलन की कमी

समस्या विज्ञान में नहीं, बल्कि संतुलन की कमी में है।

आधुनिकता के नाम पर हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटते जा रहे हैं।

पुरातन ज्ञान को अंधविश्वास समझकर त्याग देना भी एक प्रकार की भूल है।

आज समाज में राजनीतिक और सामाजिक  उलझनें बढ़ती जा रही हैं आज समाज में व्याप्त कई उलझनें राजनीतिक स्वार्थों से भी जुड़ी हुई हैं।

विचारों को जोड़ने के बजाय उन्हें तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

अंत में सभी कारकों को सम्माहित करते हुए कहा कि 

धर्म, संस्कृति और इतिहास को भी राजनीति के औज़ार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

जबकि आज की वास्तविक आवश्यकता विज्ञान और संस्कृति के बीच संतुलन होना चाहिए 

मनुष्य को पहले “मनुष्य” के रूप में देखना

संतों और विचारकों को वर्गों से ऊपर समझना

विभाजन के बजाय सह-अस्तित्व और मानवता को प्राथमिकता देना। 

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